सोनपुर, सत्यम ग्राम न्यूज़। विधानसभा चुनाव के महीना नजदीक आते देख नेताजी गिरगिट के तरह से रंग बदलना शुरू कर दिए हैं। जितना नेताजी रंग बदल रहे हैं ऐसा रंग गिरगिट के बाप भी नहीं बदल रहा होगा। अब नेता जी के 4. साल क़े बाद जनता क़े दुःख दर्द व समस्याओं क़े साथ उनका हाल चाल भी पूछना शुरू कर दिए। अब सोनपुर विधानसभा क्षेत्र में राजनीतिक रंग पूरी तरह से गहरा चुका है।
चुनावी मौसम की आहट मिलते ही संभावित प्रत्याशी व उनके समर्थक जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने में जुट गए हैं। सूत्रों से मिली जनकारी अनुसार बीजेपी, राजद, जदयू, कांग्रेस, लोजपा क़े अब तक एक दर्जन से अधिक संभावित उम्मीदवारों ने अपने-अपने क्षेत्रों में पहुँच कर इस तरह से हमदर्दी दिखा रहे और जनता से हाल चाल पूछ रहे है जैसा बहुत बड़ा रहनुमा है। सोनपुर विधानसभा में अनेक समस्याओं से जनता 4 सालो से परेशान है लेकिन उन समस्याओं से निजात दिलाने क़े लिए कभी बैठक तक गिरगिट नेताजी नहीं की। अब गिरगिट क़े तरह रंग बदलकर वोट लेने क़े लिए हमदर्दी बन गए है।
बिहार की जनता जाति, दल, धर्म क़े कूटनीति रजनीतिक से उपर उठकर अपने, व क्षेत्र क़े विकास पर वोट दे तभी क्षेत्र का विकास होगा। तो वही दूसरी ओर इस कूटनीति राजनीतिक में नई पार्टी क़े रूप में जन सुराज पार्टी आयी है जो इन नेताओं से पीछे कहा कम है वे भी जनता क़े 15 साल राजद, 20 साल जदयू ,बीजेपी अन्य दलों क़े गठबंधन क़े कार्य प्रणालियो क़े पोल खोलते हुए विकसित बिहार के नये नये सपना दिखाने में लगे हुए है। जिस तरह से जन सुराज पार्टी बिहार में अपना पाँव फैला रही है आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा, राजद,जदयू क़े नैया डुबाने में लग गयी है। लगता है कि जन सुराज क़े सूत्रधार प्रशांत किशोर बिहार क़े हर अनुमंडल, जिला में दौरा कर बिहार क़े जनता को जागरूक कर रहे है ऐसे में लगता है कि सुशासन बाबु क़े लिए इस बार मुसीबत ख़डी न कर दे।
यह भी कहने में संकोच नहीं कि बिहार क़े जनता क़े लिए नई विकल्प क़े रूप में जन सुराज दिख रही है जैसे राजद क़े सरकार से जनता परेशान थी तो नई विकल्प क़े रूप में नितीश कुमार आये ठीक उसी तरह से इस बार भी जनता को नई बिकल्प मिल गयी है। 20 साल क़े शासनकाल में भी बिहार पिछड़ा राज्य आज भी है और समस्याओं, पलायन, रोजगार से बिहार उभर नहीं पाया।
बतादे कुछ दिन पहले नेताओं का जबरदस्त होली मिलन, चैता समारोहों का आयोजन में लोकप्रिय अभिनेता, गायक और सांस्कृतिक कलाकारों को बुलाकर रंगारंग प्रस्तुतियां कराई जा रही है ताकि जनता का अधिकाधिक समर्थन जुटाया जा सके। इस बार होली मिलन समारोहों व चैता गायन कार्यक्रम की संख्या और भव्यता पिछले साल की तुलना में कई गुना अधिक देखी गयी ।सभी कार्यक्रम में नेताजी अपने समर्थको क़े साथ पहुँच कर हाथ जोड़कर हाल चाल ले रहे है जैसे लगता है कि क्षेत्र क़े रहनुमा आ गए हो। वर्तमान में रमजान होने क़े कारण मुस्लिम वोट हासिल करने क़े लिए उन्हें भी रिझाने में लगे हुए थे । जितने भी प्रत्यासी उम्मीदवार है वे कभी भी समाज क़े लोगो क़े साथ स्वास्थ, शिक्षा, रोजगार, पलायन, जैसी समस्याओं को लेकर बैठक एक बार भी करना उचित नहीं समझे यानी कहा जाए तो कहावत चिरतार्थ बैठती है– चुनाव के बाद भार में जाए जनता अपना काम बनता। चुनावी साल होने क़े कारण शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक चौक चौराहो पर ये आयोजन चर्चा का विषय बन रहे है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि होली, रमजान के बहाने संभावित प्रत्याशी अपने समर्थकों को गोलबंद करने और चुनावी माहौल को अपने पक्ष में करने की रणनीति अपना रहे हैं। खास बात यह है कि इन आयोजनों में अलग-अलग समुदायों और वर्गों को जोड़ने का विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जिससे जातीय और सामाजिक संतुलन साधा जा सके।
अब देखना यह लाजमी होगा कि आने वाले विधानसभा के चुनाव में नेताओं की लोक लुभावन वादे और जाति धर्म क़े चक्कर और उनके मकर जाल में बिहार क़े जनता फंस रहे हैं या क्षेत्र क़े विकास क़े लिए अपना कीमती वोट विकसित बिहार क़े नाम पर वोट डाल रहे है।
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Author: AKHILESH KUMAR
Editor in Chief